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CM के रूप मे ताजपोशी और फिर बगावत का बने चेहरा, ऐसा रहा है विजय बहुगुणा का सियासी सफर

CM के रूप मे ताजपोशी और फिर बगावत का बने चेहरा, ऐसा रहा है विजय बहुगुणा का सियासी सफर

उत्तराखंड में हाल ही में विधानसभा के चुनाव सपन्न हुए हैं। लेकिन इस दौरान कभी उत्तराखंड की राजनीति में सुर्खियों में रहने वाले विजय बहुगुणा राजनीतिक वनवास में दिखे। कांग्रेस पार्टी से अपना सियासी सफर शुरू करने वाले राजनेता इन दिनों बीजेपी से राजनीति में सक्रिय हैं। हम यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री हेमतवती नंदन बहुगुणा के पुत्र और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रह चुके विजय बहुगुणा के बारे में बात कर रहे हैं। सियासत वैसे तो विजय बहुगुणा को विरासत में मिली लेकिन राजनीति में आने से पहले वो एक वकील और फिर हाईकोर्ट के जज की भूमिका भी निभा चुका है।

शुरुआती सफर और परिवार

विजय बहुगुणा का जन्म 28 फरवरी 1947 को इलाहाबाद में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और एक स्वतंत्रता सेनानी थे। हेमनती नंदन बहुगुणा ने भी असहयोग आंदोलन में भाग लिया। 1984 में अमिताभ और राजीव गांधी के करीबी रिश्ते की वजह से कांग्रेस ने इलाहाबाद सीट से उन्हें हेमवती नंदर बहुदगुणा के सामने खड़ा कर दिया। उन्होंने बड़े अंतर से हेमवती नंदन बहुगुणा को हराया। उस वक्त दोनों की सियासी लड़ाई काफी चर्चित हुई थी। विजय बहुगुणा की बहन रीता बहुगुणा वर्तमान में प्रयागराज से सांसद हैं। रीता कांग्रेस की पूर्व नेता और उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी की पूर्व अध्यक्ष रह चुकी हैं। वह 20 अक्टूबर 2016 को भाजपा में शामिल हुईं और उत्तर प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री थीं।

दो साल तक CM, फिर बीजेपी में एंट्री

2012 के चुनाव में कांग्रेस पार्टी को जनता का जनादेश प्राप्त हुआ। हरीश रावत, हरक सिंह रावत और इंदिरा ह्रदयेश जैसे तमाम तैरते नामों के बीच दस जनपथ ने विजय बहुगुणा के नाम पर अपनी मुहर लगाई। विजय बहुगुणा ने सितारगंज विधानसभा की सीट पर उपचुनाव के जरिये जीत दर्ज की और राज्य के मुख्यमंत्री बन गए। 31 जनवरी 2014 तक सीएम रहने के बाद कांग्रेस ने उन्हें हटाकर हरीश रावत को मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंप दी। बाद में कांग्रेस ने प्रदेश में बगावत देखी और जिसका मुख्य चेहरा विजय बहुगुणा बनकर उभरे। 2017 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले वो बीडेपी में शामिल हो गए। बीजेपी ने उनकी सीट से विजय बहुगुणा के बेटे सौरभ को टिकट दिया और चुनाव में जीत हासिल की।

 

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