उत्तराखंड

कैरियर काउंसलिंग प्रकोष्ठ के तत्वाधान में एवम G- 20 के उपलक्ष्य में आज “राजनीति में गांधीवादी विमर्श” विषय पर व्याख्यान माला का हुआ आयोजन

कैरियर काउंसलिंग प्रकोष्ठ एवं आइक्यूएसी के संयुक्त तत्वाधान में इस कार्यशाला का आयोजन किया गया

कोटाबाग |राजकीय महाविद्यालय कोटाबाग के कैरियर काउंसलिंग प्रकोष्ठ के तत्वाधान में एवम G- 20 के उपलक्ष्य में आज “राजनीति में गांधीवादी विमर्श” विषय पर व्याख्यान माला का आयोजन किया गया । कैरियर काउंसलिंग प्रकोष्ठ एवं आइक्यूएसी के संयुक्त तत्वाधान में इस कार्यशाला का आयोजन किया गया । आयोजन सचिव डॉक्टर सत्यनन्दन भगत जी ने कार्यशाला के मुख्य वक्ता प्रोफेसर अनिल दत्त मिश्रा फॉर्मर डिप्टी डायरेक्टर नेशनल गांधी म्यूजियम नई दिल्ली का स्वागत किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्राचार्य प्रोफेसर नवीन भगत जी ने करी । कार्यक्रम वर्चुअल मोड में चला । प्रोफेसर अनिल का कहना था कि गांधी जी सत्य अहिंसा के पुजारी तो थे ही गांधी जी की जो सबसे बड़ी बात जो वर्तमान युवाओं को और वर्तमान पीढ़ी को सीखनी है और सीखनी चाहिए वह यह है कि गांधीजी समय के बहुत पाबंद हुआ करते थे, यदि हम किसी भी कार्य में समय की पाबंदी का अक्षरशः पालन करेंगे तो हमारा आधा काम पहले ही सफल हो जाएगा। उन्होंने वर्तमान शिक्षकों से अपील की कि यदि उनकी कक्षा 9:00 बजे की है तो वह 8:55 पर अपनी कक्षा में पहुंचे तभी कक्षा में छात्र-छात्राएं वास्तविक रूप से लाभान्वित होंगे । प्रोफेसर मिश्रा का यह भी कहना था कि खाली गांधीवादी चिंतन को मंचों के माध्यम से अंगीकार करके नहीं होगा गांधी जी के विचारों को अपने जीवन में भी उतारना होगा। तभी वास्तव में हम गांधी जी के विचारों का लाभ स्वयं को और समाज को दे पाएंगे। प्रोफेसर अनिल दत्त मिश्रा जी ने यह भी कहा कि गांधीजी राजनीति में किसी प्रकार का छल, कपट, प्रपंच , इसकी टोपी उसके सर उसकी टोपी इसके सर वाली कहावत को पसंद नहीं करते थे। वह स्वस्थ लोकतंत्र की कल्पना करते थे , और स्वस्थ राजनीति की बात करते थे।प्रोफेसर मिश्रा ने अपनी बात को आगे रखते हुए यह कहा कि गांधीजी को महात्मा यूं ही नहीं कहा जाता , उनके सत्य ,अहिंसा के प्रति विचार और उसका जीवन में पालन करना , उनके स्वदेशी के विचार ,अपनी मिट्टी से उनका लगाव , जल जंगल जमीन से जुड़ाव ,जाति, पाती भेदभाव से ऊपर रहना ,महिलाओं का सम्मान ,स्वदेशी वस्तुओं का सम्मान, तिरंगे का सम्मान , स्वदेशी को अपनाना अपनी मिट्टी का सम्मान ।
यह सब वह बातें थी जिन्होंने गांधीजी को मोहनदास करमचंद गांधी से महात्मा गांधी बनाया, और यही वह गुण थे जिन्होंने महात्मा गांधी जी को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी बनाया । वर्तमान परिपेक्ष में यदि हम देखें तो आज की युवा पीढ़ी को गांधी जी के विचारों को अपने जीवन में आत्मसात करने की परम आवश्यकता है ।गांधी जी के राजनीतिक चिंतन, गांधी जी का सामाजिक चिंतन, गांधी जी का आर्थिक चिंतन और गांधी जी की देश के प्रति ,देशवासियों के प्रति, स्वदेश के प्रति जो सोच है आज आवश्यकता उस सोच को सकारात्मक ढंग से मन मस्तिष्क में न केवल लेने की है बल्कि जीवन में उसे उतारने की भी।
गांधीजी की कथनी और करनी में कभी भी फर्क नहीं था वह कोई भी काम तब तक दूसरे को नहीं बताते थे जब तक कि स्वयं वह उस कार्य को नहीं कर लेते थे वर्तमान परिपेक्ष में वर्तमान युवा पीढ़ी को हम देखें तो उनकी कथनी और करनी में विरोधाभास और स्पष्ट अंतर नजर आता है ऐसे में गांधी जी के विचार और भी ज्यादा प्रासंगिक हो जाते हैं गांधीजी के विचार संपूर्ण जीवन दर्शन को बताते हैं गांधीजी के विचारों को यदि पालन कर लिया जाए तो देश में रामराज की कल्पना नहीं होगी बल्कि देश में रामराज हो जाएगा। इस अवसर पर कार्यक्रम का संचालन डॉक्टर सत्यनन्दन भगत जी ने किया। कार्यक्रम में डॉ हरीश चंद्र जोशी, डॉक्टर दिनेश, डॉक्टर आलोक, डॉक्टर परितोष , डॉक्टर बिंदिया राय सिंह, डॉक्टर विनोद कुमार उनियाल, समेत सैकड़ों छात्र-छात्राओं ने इस कार्यशाला का लाभ उठाया ।
कार्यक्रम में विशेष सहयोग श्री भुवन चंद्र भट्ट एवं गोधन कार्की जी का रहा ।
तकनीकी रूप से विशेष सहयोग प्रदान करने में भूगोल विभाग के विद्वान प्राध्यापक डॉ परितोष उप्रेती जी रहे।

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