विरासत साधना कार्यक्रम में देहरादून के स्कूलो के छात्र-छात्रों ने शास्त्रीय गीत एवं संगीत की सानदान प्रस्तुतियां दी – Himkelahar – Latest Hindi News | Breaking News in Hindi

विरासत साधना कार्यक्रम में देहरादून के स्कूलो के छात्र-छात्रों ने शास्त्रीय गीत एवं संगीत की सानदान प्रस्तुतियां दी

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देहरादून-31 अक्टूबर 2023- विरासत आर्ट एंड हेरीटेज फेस्टिवल 2023 के चौथे दिन के कार्यक्रम की शुरूआत विरासत साधना के साथ हुआ। विरासत साधना कार्यक्रम में देहरादून के छात्रों द्वारा शास्त्रीय संगीत प्रस्तुत किए गए। गायन श्रेणी में 19 स्कूलों के छात्रों ने भाग लिया, जिसमें सोशल बलूनी पब्लिक स्कूल के अनिरुद्ध नौटियाल और मयंक सुंदरवाल शामिल थे, उन्होंने मधुबन में राधिका नाचे प्रस्तुत किया। हिल फाउंडेशन स्कूल की ऋतकृति नेगी और शुभम ध्यानी ने कल्याण थाट का भारतीय शास्त्रीय राग, राग यमन प्रस्तुत किया, फीलफोट पब्लिक स्कूल देहरादून की अदिति वर्मा और योगेश खेतवाल ने राग यमन प्रस्तुत किया, दून इंटरनेशनल स्कूल की ओजस्वी पैन्यूली और विबुषित ने राग दुर्योधराक्ष प्रस्तुत किया। द टॉम्सब्रिज स्कूल के कृत्यंजय मोहन दास, कुलदीप पंथ और तारश सेठी ने राग अहीर भैरव प्रस्तुत किया। एसजीआरआर यूनिवर्सिटी के प्रद्युम्न नौटियाल और सचिन मैथली ने राग राष्ट्ररेयाग प्रस्तुत किया। ग्ली म्यूजिक एकेडमी की प्रगति राणा और स्वरा आहूजा ने बृंदावाणी सारंग प्रस्तुत किया। एसजीआरआर पब्लिक स्कूल सहस्त्रधारा रोड की अर्चना और राजेश कलोनी ने भैरवी राग प्रस्तुत किया। सरस्वती संगीत मंदिर राग भैरव से वंश थापा, परितोष शर्मा और स्पर्श सेठी ने अपनी प्रस्तुति दी। होपवे पब्लिक स्कूल की लतिका, अनिल नौटियाल और नवीन उनियाल ने ज्योति कलश चालके प्रस्तुत किये। सेंट ज्यूड्स स्कूल की अनुश्री पोखरियाल, योगेश खेतवाल और सौरव आहूजा ने राग बिहाग प्रस्तुत किया। हिल्टन स्कूल के आराध्या रावत, योगेश खेतवाल और सौरव आहूजा ने राग भोपाली प्रस्तुत किया। शेमरॉक नकरौंदा के अधिप्रिय नौटियाल, योगेश खेतवाल और सौरव आहूजा ने राग मालकोश में बंदिश और तराना प्रस्तुत किया। बरगद के पेड़ से दृष्टि कनौजिया योगेश खेतवाल और सौरव आहूजा ने राग मेघ प्रस्तुत किया। तरूण संगीत एवं विचार मंच के देवांश अवस्थी, योगेश खेतवाल और सौरव आहूजा ने राग भोपाली प्रस्तुत किया। यूनिवर्सल एकेडमी से वर्तिका सिंह, योगेश खेतवाल और सौरव आहूजा ने राग यमन से बड़ा ख्याल प्रस्तुत किया। विरासत साधना की आयोजक श्रीमती साधना जी ने प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र वितरित किए।

आज के सांस्कृतिक कार्यक्रम का शुभांरंभ डॉ. बी. वी. आर. सी. पुरुषोत्तम, आईएएस, पशुपालन, मत्स्य पालन और डेयरी, उत्तराखंड सरकार ने दीप प्रज्वलन के साथ किया एवं उनके साथ रीच विरासत के महासचिव श्री आर.के.सिंह एवं अन्य सदस्य भी मैजूद रहें।

सांस्कृतिक कार्यक्रम की पहली प्रस्तुति मे रोनू मजूमदार और यू राजेश द्वारा बांसुरी और मैंडोलिन पर जुगलबंदी प्रस्तुत किया गया। जिसमें उन्होंने कर्नाटक संगीत में राग मोहनम के साथ प्रदर्शन शुरू किया जो राग भूपाली के समान है, उनके प्रस्तुति में श्री श्रीनिवासन मृदंगम पर संगत कर रहे थे। उनकी अगली प्रस्तुति रागमाला रही।

रोनू मजूमदार जी ने अपनी शिक्षा अपने पिता से शुरू की, जिन्होंने स्वर्गीय पंडित पन्नालाल घोष से शिक्षा ली थी ,जो बांसुरी वादन के अग्रणी थे और उन्होंने ही इसे शास्त्रीय संगीत में पेश किया था। रोनू जी के पिता ही उनके पहले गुरु थे और फिर वह बाद में सर्वकालिक महान बांसुरीवादक स्वर्गीय पंडित विजय राघव राव जी के शिष्य बने। रोनू जी को स्वर संगीत का प्रशिक्षण पंडित लक्ष्मण प्रसाद जयपुरवाले से मिला । उनके बहुत ही प्रसिद्ध गीत “अथः स्वागतम, शुभ स्वागतम“ की रिकॉर्डिंग के समय उनकी मुलाकात भारत रत्न पंडित रविशंकर जी से हुई। श्री रविशंकर जी रोनू जी की संगीत क्षमताओं से प्रसन्न हुए और फिर वह इसका हिस्सा भी बन गए।

रोनू जी को उनका सबसे पहला पुरस्कार ऑल इंडिया रेडियो में मिला उसके बाद उन्हें अनेको पुरस्कार मिले जैसे की आदित्य विक्रम बिड़ला पुरस्कार, संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार 2014 और नवभारत टाइम्स द्वारा लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार, पंडित जसराज गौरव पुरस्कार, राष्ट्रीय कुमार गंधर्व पुरस्कार 2006 और वर्ष 2008 में पंडित जसराज गौरव पुरस्कार। उन्हें बेला फ्लेक और अन्य के साथ एल्बम ’टेबुला रस’ के लिए ग्रैमी अवार्ड के लिए भी उन्हें चुना गया उन्होंने अपना बॉलीवुड का सफर साल 1981 में आर.डी. बर्मन की मदद से शुरू किया था ।उन्होंने लता मंगेशकर के साथ भी कई बहुत यादगार गानों में परफॉर्म भी किया है। जो की आज भी लोग सुनना बहुत पसंद करते है। वह फिल्म “माचिस“ के लिए विशाल भारद्वाज के साथ भी जुड़े रहे हैं।

यू राजेश कर्नाटक संगीत के मैंडोलिन वादक है, कम उम्र से ही उन्होंने संगीत की शिक्षा अपने पिता और भाई यू.श्रीनिवासन से प्राप्त की। उन्होंने 6 साल की उम्र में मैंडोलिन पर कर्नाटक शास्त्रीय संगीत बजाना शुरू किया और श्री चन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वती. की उपस्थिति में कांची कामकोटि पीठम में अपना पहली संगीत कार्यक्रम की प्रस्तुति दी। उन्होंने और उनके भाई ने एक साथ संगीत कार्यक्रमों में प्रदर्शन किया है, और एक साथ संगीत एल्बम भी जारी की हैं। वह संगीत विद्यालय, श्रीनिवास इंस्टीट्यूट ऑफ वर्ल्ड म्यूजिक ैप्व्ॅड हैं, जो विद्यार्थियों को निःशुल्क संगीत शिक्षण प्रदान करते है।

जॉन मैकलॉघलिन के एल्बम फ़्लोटिंग पॉइंट के साथ उनके काम को 2009 में ग्रैमी नामांकन प्राप्त हुआ और उन्होंने लिंकन सेंटर, न्यूयॉर्क शहर में भी प्रदर्शन किया है। उन्होंने लंदन, मेलबर्न कॉन्सर्ट हॉल, सिटी डे ला म्यूसिक, पेरिस, ग्रीस, कनाडा, मध्य-पूर्व, संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोप में बीबीसी लाइव के लिए संगीत कार्यक्रम किए हैं। उन्होंने जोहान्सबर्ग फिलहारमोनिक ऑर्केस्ट्रा के साथ भी प्रदर्शन किया है। अप्रैल 2007 में उन्हें भारत के राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित किया गया। उन्होंने सोलो एल्बम के साथ- साथ अन्य कलाकारों के सहयोग से विभिन्न एल्बम जारी किए हैं। म्यूजिकल एल्बम समजनिथा में वह खुद, यू. श्रीनिवास, जाकिर हुसैन, शिवमणि और जॉर्ज ब्रूक के साथ शामिल थे।

सांस्कृतिक कार्यक्रम की दूसरी प्रस्तुति में गायिका सुधा रगुनाथन ने सार्वभौमिक मां को समर्पित राग खमाज में ’माथे एक वर्णम’ के साथ अपना प्रस्तुति शुरू किया उसके बाद में भगवान गणेश के आह्वान के साथ संगीतकार श्री मुथुस्वामी दीक्षितार द्वारा ’काशी रामक्रिया’ को संबोधित ’राग पंटुवराली’ की प्रस्तुति दी उसके बाद उन्होंने कुछ भक्तिमय लोक रचना तेलुगु में मुथुस्वामी दीक्षित कृति, महा गणपतिम मनसा स्मरामी राग नट्टई, मुथुस्वामी दीक्षितर पुरिया धनश्री द्वारा पंटुवराली मुख्य राग के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ। उनके साथ कर्नाटक संगीत के समर्पित कलाकार, वायलिन वादक आर. श्रीधर रहे, उन्हें सबसे प्रतिष्ठित बिस्मिल्लाह खान युवा पुरस्कार, ए ग्रेड रेडियो कलाकार और संस्कृति मंत्रालय में जूनियर फेलो से सम्मानित किया गया था मृदंगम पर स्कंद सुब्रमण्यम उनके संगत मे रहे।

भारत में कर्नाटक संगीत के सबसे चमकीले सितारों में से एक प्रमुख गायिका सुधा रगुनाथन जी भी हैं। जिनकी आवाज़ दुनिया भर के श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देती है। उन्हे कई प्रतिष्ठित पुरुस्कार भी मिले जिन्मे से एक पद्मभूषण और संगीता कलानिधि भी शामिल हैं।

सुधा रगुनाथन जी की गायन तकनीकों और जटिल शैलियों पर महारत हासिल हैं , ’कृति’ ’राग’ और ’कल्पना स्वर’ की उनकी प्रामाणिक प्रस्तुति, सप्तक पर उनकी पकड़ उन्हें सर्वोच्च कलाकार बनाती है। उन्होंने दुनिया भर में कई संगीत समारोहों में अपना प्रदर्शन बख़ूबी निभाया और लाखों लोगो को अपनी आवाज़ से प्रभावित किया इसी के साथ साथ उन्होंने प्रमुख रिकॉर्डिंग कंपनियों के साथ 200 से अधिक एल्बम भी जारी किए। वह प्रसार भारती, ऑल इंडिया रेडियो और दूरदर्शन मे एक शीर्ष रैंकिंग कलाकार हैं। सुधा जी को स्वतंत्र भारतीय गणतंत्र के 50 वर्ष पूरे होने के अवसर पर 27 जनवरी 2000 को संसद के सेंट्रल हॉल, नई दिल्ली में ’वंदे मातरम’ प्रस्तुति करने के लिये अद्वितीय सम्मान भी प्राप्त हुआ है!

सुधा जी ने अपने प्रशिक्षित की शुरुआत अपनी माँ श्रीमती चूड़ामणि से की जिन्होंने शुरू में उन्हें प्रशिक्षित किया था। 1977 में, सुधा जी को केंद्र सरकार से छात्रवृत्ति मिली, जिससे उन्हें पद्मभूषण संगीत कलानिधि डॉ. एम.एल. के अधीन अध्ययन करने का अवसर भी मिला। वह एक समर्पित कलाकार हैं, जो हमेशा उत्कृष्टता के लिए प्रयासरत रहती हैं। संगीत में अपनी सफलता के अलावा, सुधाजी ने 1999 में “समुदाय फाउंडेशन“ की शुरुआत की, जो एक धर्मार्थ संगठन है जिसने कई सामाजिक और शैक्षिक कारणों और उपशामक देखभाल में योगदान दिया है। सुधा जी ने कर्नाटक संगीत को निगम स्कूलों, दूरदराज के गांवों और जेलों में भी पहुंचाया है।

सांस्कृतिक कार्यक्रम की तीसरी प्रस्तुतियों में रूस से आय हुए अंतरराष्ट्रीय कलाकारों के समूह “रकेता“ टीम द्वारा रूसी नृत्य में गति के साथ कविता और संस्कृति का अनुभव कराते हुए कई कहानी का वार्णन किया, जो सभी नर्तक एक समान गति, ऊर्जा और लय से भरी थी। “रकेता“ टीम में शामिल कलाकारों में अनास्तासिया पारकोवा, एलिज़ावेटा बुसीगिना, यूलियाना दरमन, एकाटरिना रिझोवा, यूलिया तेचेरीकोवा, क्रिस्टीना कराम्यशेवा, डानिल वेरेश्चागिन, मक़सीम कोकानोव, सरगेई टूपिक, आरटेम सलोन, आन्देरी बाजीन और पोलिना कोरोलेवा ने अपनी प्रस्तुति दी।

आधुनिक नृत्य समूह “रकेता“ टीम की स्थापना 1995 में हुई थी। इसके प्रतिभागी निज़नी नोवगोरोड के विभिन्न विश्वविद्यालयों के छात्र हैं।
नृत्य और कोरियोग्राफी का आधुनिक स्कूल नई विधियों और तकनीको का उपयोग करते हुए डेनिला वीरेशचागिन के निर्देशन में, एक दिशा के साथ प्रस्तुतियाँ बनाई गई हैं जिसे छम्व्थ्व्स्ज्ञ कहते है, जो रूस के लोक नृत्य है, यह कई नृत्य रूपों का संकलन है, जैसे समकालीन नृत्य, पारंपरिक और आधुनिक कोरियोग्राफिक तकनीकों के साथ लोक नृत्य। समूह लोगों के जीवन से जुड़ी कहानियाँ प्रस्तुत करता है। कलाकारों की टुकड़ी “रॉकेट“ रूस में इस शैली के सबसे प्रतिभाशाली प्रतिनिधियों में से एक है।मंच की पोशाकें, राष्ट्रीय विशेषताओं और रूसी संस्कृति की आत्मा को दर्शाने वाले विभिन्न विषयों और अभिव्यक्तियों का संग्रह हैं। उनके कट, बनावट और रंग, जो आधुनिक कोरियोग्राफी की विभिन्न शैलियों से मेल खाते है, वेशभूषा के रूप, स्तर और चाल में ज्वलंत कल्पना, नाटकीय विकास पर हावी हैं। अपनी प्रस्तुति में कलाकारों की टुकड़ी “रॉकेट“ न केवल निज़नी नोवगोरोड में जाना जाता है, बल्कि रूस और विदेशों के विभिन्न क्षेत्रों में भी जाना जाता है। इस समूह ने रूस में कई महत्वपूर्ण और प्रमुख सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लिया है, जहां वे हमेशा विजेता रहे हैं और उन्हें बहुत प्रतिष्ठित पुरस्कार प्राप्त हुए हैं।

बड़ी सफलता के साथ, समूह ने चेक गणराज्य, तुर्की, पोलैंड, बुल्गारिया, बेलारूस, एस्टोनिया, लातविया, सर्बिया, स्लोवाकिया, जर्मनी, अल्जीरिया और अब्खाज़िया में अंतरराष्ट्रीय त्यौहारों और प्रतियोगिताओं में भाग लिया, जहां उन्हें आयोजकों और दर्शकों से उच्च प्रशंसा मिली। अपने कलात्मक कौशल और संगीत कार्यक्रम की गतिविधियों के लिए, आधुनिक नृत्य समूह को “लोक कला के सम्मानित समूह“ का खिताब मिला। जिनके कलात्मक निर्देशक डेनिला वीरेशचागिन और नताल्या वीरेशचागिन हैं। 2022 में, कोरियोग्राफर और नृत्य निर्देशक डेनिला वीरेशचागिन को रूस के राष्ट्रपति के आदेश द्वारा “रूसी संघ की संस्कृति के सम्मानित कार्यकर्ता“ की उपाधि से सम्मानित किया गया था।

तबला वादक शुभ जी का जन्म एक संगीतकार घराने में हुआ था। वह तबला वादक श्री किशन महाराज के पोते हैं। उनके पिता श्री विजय शंकर एक प्रसिद्ध कथक नर्तक हैं, शुभ को संगीत उनके दोनों परिवारों से मिला है। बहुत छोटी उम्र से ही शुभ को अपने नाना पंडित किशन महाराज के मार्गदर्शन में प्रशिक्षित किया गया था। वह श्री कंठे महाराज.की पारंपरिक पारिवारिक श्रृंखला में शामिल हो गए। सन 2000 में, 12 साल की उम्र में, शुभ ने एक उभरते हुए तबला वादक के रूप में अपना पहला तबला एकल प्रदर्शन दिया और बाद में उन्होंने प्रदर्शन के लिए पूरे भारत का दौरा भी किया। इसी के साथ उन्हें पद्म विभूषण पंडित के साथ जाने का अवसर भी मिला। शिव कुमार शर्मा और उस्ताद अमजद अली खान. उन्होंने सप्तक (अहमदाबाद), संकट मोचन महोत्सव (वाराणसी), गंगा महोत्सव (वाराणसी), बाबा हरिबल्लभ संगीत महासभा (जालंधर), स्पिक मैके (कोलकाता), और भातखंडे संगीत महाविद्यालय (लखनऊ) जैसे कई प्रतिष्ठित मंचों पर प्रदर्शन किया है।

परोमिता मुखर्जी ने 30 साल से भी पहले अपने हारमोनियम के साथ अपनी यात्रा शुरू की थी। पारोमिता जी देश में महिला हारमोनियम एकल कलाकारों मे से एक ऐसी कलाकार हैं जो वायलिन और गायन संगीत में भी रुचि रखती हैं, वह ऑल इंडिया रेडियो में एक ग्रेडेड कलाकार भी हैं। जब वह सिर्फ 10 साल की थीं, तब उनकी चाची ने उन्हें हारमोनियम से परिचित कराया था । वहां से, पारोमिता अपनी चाची, जो एक गायिका थीं उनके साथ विभिन्न शो में जाने लगीं। शादी के बाद उन्होंने विभिन्न कलाकारों के साथ अपनी प्रस्तु जारी रखी। उनके गुरु पंडित वी जी जोग, उस्ताद आशीष खान, गुरु अमीना परेरा, पंडित अमिय रंजन बनर्जी और काबेरी रहे हैं। पारोमिता जी ने पूरे भारत एवं फ्रांस, सिंगापुर, अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम और न्यूजीलैंड जैसे कई देशों में भी प्रदर्शन किया है। वह युवा पीढ़ी को वायलिन और हारमोनियम की बारीकियां सिखाना बेहद पसंद करती हैं।

27 अक्टूबर से 10 नवंबर 2023 तक चलने वाला यह फेस्टिवल लोगों के लिए एक ऐसा मंच है जहां वे शास्त्रीय संगीत एवं नृत्य के जाने-माने उस्तादों द्वारा कला, संस्कृति और संगीत का बेहद करीब से अनुभव कर सकते हैं। इस फेस्टिवल में परफॉर्म करने के लिये नामचीन कलाकारों को आमंत्रित किया गया है। इस फेस्टिवल में एक क्राफ्ट्स विलेज, क्विज़ीन स्टॉल्स, एक आर्ट फेयर, फोक म्यूजिक, बॉलीवुड-स्टाइल परफॉर्मेंसेस, हेरिटेज वॉक्स, आदि होंगे। यह फेस्टिवल देश भर के लोगों को भारत की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर और उसके महत्व के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानकारी प्राप्त करने का मौका देता है। फेस्टिवल का हर पहलू, जैसे कि आर्ट एक्जिबिशन, म्यूजिकल्स, फूड और हेरिटेज वॉक भारतीय धरोहर से जुड़े पारंपरिक मूल्यों को दर्शाता है।

रीच की स्थापना 1995 में देहरादून में हुई थी, तबसे रीच देहरादून में विरासत महोत्सव का आयोजन करते आ रहा है। उदेश बस यही है कि भारत की कला, संस्कृति और विरासत के मूल्यों को बचा के रखा जाए और इन सांस्कृतिक मूल्यों को जन-जन तक पहुंचाया जाए। विरासत महोत्सव कई ग्रामीण कलाओं को पुनर्जीवित करने में सहायक रहा है जो दर्शकों के कमी के कारण विलुप्त होने के कगार पर था। विरासत हमारे गांव की परंपरा, संगीत, नृत्य, शिल्प, पेंटिंग, मूर्तिकला, रंगमंच, कहानी सुनाना, पारंपरिक व्यंजन, आदि को सहेजने एवं आधुनिक जमाने के चलन में लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है और इन्हीं वजह से हमारी शास्त्रीय और समकालीन कलाओं को पुणः पहचाना जाने लगा है।

विरासत 2023 आपको मंत्रमुग्ध करने और एक अविस्मरणीय संगीत और सांस्कृतिक यात्रा पर फिर से ले जाने का वादा करता है।

 

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