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मोरबी ब्रिज में हुआ हादसा किसकी लापरवाही से हुआ

केबल ब्रिज 140 साल से ज्यादा पुराना बताया जा रहा है. यह ब्रिटिश शासन के दौरान बनाया गया था.

गुजरात के मोरबी में रविवार को हुए ब्रिज हादसे में मरने वालों की संख्या 134 हो गई है. ये केबल ब्रिज मच्छु नदी पर बना था. रविवार शाम करीब 6.30 बजे ब्रिज अचानक से टूट गया और सैकड़ों लोग नदी में समा गए. चौंकाने वाली बात ये है कि ब्रिज 7 महीने से बंद था. इसे मरम्मत के बाद 5 दिन पहले ही आम जनता के लिए खोला गया था. इस हादसे के बाद प्रशासन और मोरबी ब्रिज का मैनेजमेंट देख रही Oreva कंपनी सवालों के घेरे में आ गई है. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर ये हादसा किसकी लापरवाही के चलते हुआ. केबल ब्रिज 140 साल से ज्यादा पुराना बताया जा रहा है. यह ब्रिटिश शासन के दौरान बनाया गया था. राजा-महाराजाओं के समय का यह पुल ऋषिकेश के राम-झूला और लक्ष्मण झूला पुल कि तरह झूलता हुआ सा नजर आता था, इसलिए इसे झूलता पुल भी कहते थे. इसे गुजराती नव वर्ष पर महज 5 दिन पहले ही रिनोवेशन के बाद चालू किया गया था. यह पुल 7 महीने से बंद था. ऐसे में ये सवाल उठना लाजिमी है कि अगर मरम्मत के बाद इस पुल को खोला गया था, तो इस ब्रिज में क्या काम हुआ था और यह कैसे गिर गया? गुजरात के मोरबी में रविवार को हुए ब्रिज हादसे में मरने वालों की संख्या 134 हो गई है. ये केबल ब्रिज मच्छु नदी पर बना था. रविवार शाम करीब 6.30 बजे ब्रिज अचानक से टूट गया. चौंकाने वाली बात ये है कि ब्रिज 7 महीने से बंद था. इसे मरम्मत के बाद 5 दिन पहले ही आम जनता के लिए खोला गया था. इस हादसे के बाद प्रशासन और मोरबी ब्रिज का मैनेजमेंट देख रही Oreva कंपनी सवालों के घेरे में आ गई है. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर ये हादसा किसकी लापरवाही के चलते हुआ.

केबल ब्रिज 140 साल से ज्यादा पुराना बताया जा रहा है. यह ब्रिटिश शासन के दौरान बनाया गया था. राजा-महाराजाओं के समय का यह पुल ऋषिकेश के राम-झूला और लक्ष्मण झूला पुल कि तरह झूलता हुआ सा नजर आता था, इसलिए इसे झूलता पुल भी कहते थे. इसे गुजराती नव वर्ष पर महज 5 दिन पहले ही रिनोवेशन के बाद चालू किया गया था. यह पुल 7 महीने से बंद था. ऐसे में ये सवाल उठना लाजिमी है कि अगर मरम्मत के बाद इस पुल को खोला गया था, तो इस ब्रिज में क्या काम हुआ था और यह कैसे गिर गया?  बताया जा रहा है कि फिटनेस सर्टिफिकेट लिए बिना ही ओरेवा कंपनी ने ब्रिज को शुरू कर दिया गया था. ब्रिज पर घूमने आए लोगों को 17 रुपए का टिकट खरीदना होता था. वहीं, बच्चों के लिए 12 रुपए का टिकट अनिवार्य था. नगर पालिका चीफ ऑफिसर संदीप सिंह ने बताया कि कम्पनी ने रेनोवेशन खत्म किया है या नहीं किया इसकी जानकारी दिए बगैर ही ब्रिज छुट्टियों में शुरू किया गया और बहुत सारे लोग एक साथ भेजे थे तो उसकी वजह से हादसा हो गया. उन्होंने बताया कि नगर पालिका से फिटनेस सर्टिफिकेट भी नहीं लिया गया. प्रशासन भले ही यह कहकर पल्ला झाड़ रहा हो, कि कंपनी ने बिना फिटनेस सर्टिफिकेट के ब्रिज खोला. लेकिन अगर यह पुल 5 दिन पहले जनता के लिए शुरू किया गया था, तो क्या प्रशासन को इस बात की कोई जानकारी नहीं हुई. अगर प्रशासन को ब्रिज के शुरू होने की जानकारी थी, तो उनकी ओर से कंपनी पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं की गई.

बताया जा रहा है कि ब्रिज पर भीड़ अधिक होने के चलते ये हादसा हुआ. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर 100 लोगों की क्षमता वाले पुल पर 300-400 लोग कैसे पहुंच गए. कंपनी भीड़ के बावजूद लोगों को टिकट क्यों जारी करती रही.  रविवार को छुट्टी की वजह से ब्रिज पर काफी भीड़ थी. प्रशासन और ब्रिज का मैनेजमेंट करने वाली कंपनी लोगों से टिकट तो वसूल रही थी. लेकिन उनके पास भीड़ को काबू करने का कोई इंतजाम नहीं था. हादसे से पहले कुछ लड़के जब झूले को हिला रहे थे, तब अहमदाबाद के रहने वाले विजय ने मैनेजमेंट से इसकी शिकायत भी की. तब कंपनी ने ये कहकर पल्ला झाड़ लिया कि उनके पास भीड़ को काबू करने का कोई इंतजाम नहीं है.

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