उत्तराखंड

राज्य की दशा और दिशा तय करने में नौकरशाही की भूमिका महत्वपूर्ण – मुख्यमंत्री उत्तराखंड

यदि जनहित के कार्यों को वर्षों तक अटकाए रखा जाता है तो यह जनता के प्रति किसी बड़े अपराध से कम नहीं है

देहरादून। किसी भी राज्य को अपने पैरों पर खड़ा होने के लिए 25 वर्ष का समय कम नहीं होता। इसे देखते हुए उत्तराखंड को वर्ष 2025 तक देश के श्रेष्ठ राज्यों की श्रेणी में लाने का सरकार ने संकल्प लिया है।यह आवश्यक भी और इसकी सराहना की जानी चाहिए, लेकिन इसे हासिल करने को हर स्तर पर दायित्व बोध, आमजन की तकलीफों का त्वरित समाधान, सभी क्षेत्रों का चहुंमुखी विकास जैसे विषयों को लेकर सजगता, संवेदनशीलता होनी आवश्यक है। इसमें नौकरशाही की भूमिका सबसे अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि उसे ही राज्य की दशा और दिशा तय करनी है।

यानी, सबसे अधिक सजग व संवेदनशील तो नौकरशाही को ही होना होगा, लेकिन बीते 22 वर्षों में उसकी कार्यशैली पर हमेशा ही अंगुलियां उठती आई हैं। राज्य के विकास और जनता की समस्याओं के समाधान के प्रति उसकी जवाबदेही है, लेकिन अनेक अवसरों पर नौकरशाही का मनमाना रवैया सामने आता रहा है। मसूरी में चल रहे चिंतन शिविर में मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव ने इसे इंगित भी किया। मुख्यमंत्री ने साफ किया कि राज्य को आगे ले जाना है तो नौकरशाही की सोच अटकाने वाली नहीं, बल्कि आगे बढ़ाने वाली होनी चाहिए।

यही नहीं, मुख्य सचिव ने तो नौकरशाही को अधिक खरी-खरी सुनाई और कहा कि जो अधिकारी निर्णय लेने से कतराते हैं, उन्हें स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले लेनी चाहिए। बात भी सही है कि यदि जनहित के कार्यों को वर्षों तक अटकाए रखा जाता है तो यह जनता के प्रति किसी बड़े अपराध से कम नहीं है। कुल मिलाकर मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव, दोनों ने ही नौकरशाही को कार्यसंस्कृति में बदलाव लाते हुए राज्योन्मुखी व जनोन्मुखी सोच अपनाने का संदेश दिया है। बदली परिस्थितियों में यह आवश्यक भी है। उम्मीद की जानी चाहिए कि नौकरशाही इस संदेश को समझते हुए अपनी कार्यशैली में बदलाव लाएगी। आखिर, प्रश्न राज्य को संपन्न और सक्षम बनाने का है।

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